बरवाडीह (लातेहार)/बेतला: बेतला नेशनल पार्क क्षेत्र की प्रसिद्ध हथनी ‘राखी’ की देखभाल करने वाले पूर्व महावत मकसूद आलम आज आजीविका के संकट से जूझ रहे हैं। वर्ष 2016 में जब राखी महज एक सप्ताह की थी, तब मकसूद आलम ने उसकी जिम्मेदारी संभाली थी। करीब तीन वर्षों तक उन्होंने समर्पण भाव से उसकी परवरिश, प्रशिक्षण और सुरक्षा का दायित्व निभाया।
स्थानीय लोगों के अनुसार मकसूद आलम और हथनी के बीच गहरा भावनात्मक संबंध था। वे दिन-रात जंगल क्षेत्र में रहकर उसकी देखभाल करते थे। उनके अनुभव और प्रशिक्षण का ही परिणाम था कि राखी स्वस्थ और प्रशिक्षित हुई।
सेवा समाप्ति के बाद बढ़ा संकट
मकसूद आलम का कहना है कि उन्होंने वन विभाग के अधीन संविदा/अस्थायी रूप से कार्य किया, लेकिन उन्हें स्थायी नियुक्ति नहीं मिली। सेवा समाप्त होने के बाद अब परिवार के भरण-पोषण में कठिनाई हो रही है।
उन्होंने राज्य सरकार और वन विभाग से नियमों के तहत पुनर्नियोजन या समुचित मुआवजा देने की मांग की है।
कानूनी और प्रशासनिक पहलू
जानकारों के अनुसार वन्यजीव संरक्षण से जुड़े कार्यों में नियुक्ति भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 और राज्य सरकार की सेवा नियमावली के अनुरूप की जाती है। लंबे समय तक निरंतर सेवा देने वाले कर्मियों को संविदा नीति, श्रम कानूनों और न्यायिक निर्णयों के तहत प्राथमिकता देने का प्रावधान विभिन्न मामलों में रेखांकित किया गया है।
ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों की अपील
स्थानीय ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों ने प्रशासन से मांग की है कि अनुभवी महावत के कौशल का उपयोग पुनः वन विभाग या इको-टूरिज्म परियोजनाओं में किया जाए। उनका कहना है कि प्रशिक्षित कर्मियों की अनदेखी न केवल मानवीय दृष्टिकोण से अनुचित है, बल्कि वन्यजीव प्रबंधन के लिए भी नुकसानदेह हो सकती है।
फिलहाल मकसूद आलम प्रशासन से सकारात्मक पहल की उम्मीद लगाए हुए हैं। उनका कहना है कि यदि अवसर मिला तो वे दोबारा पूरे समर्पण के साथ वन्यजीव सेवा में योगदान देने को तैयार हैं।
