एआई के दौर में आस्था पर हमला

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  • डॉ. अतुल मलिकराम (राजनीतिक रणनीतिकार)

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आज मानव जीवन का सबसे प्रभावशाली तकनीकी औजार बन चुका है। चिकित्सा से लेकर शिक्षा और उद्योग से लेकर मनोरंजन तक, हर क्षेत्र में इसकी उपयोगिता साबित हो रही है। लेकिन हर शक्तिशाली तकनीक की तरह एआई का एक दूसरा पक्ष भी है, जो तब और भी अधिक चिंता का विषय बन जाता है जब इसका इस्तेमाल धर्म, आस्था और धार्मिक भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने के लिए होने लगे।
पिछले कुछ वर्षों में सोशल मीडिया पर एआई से तैयार किए गए ऐसे वीडियो और फोटो की बाढ़ आ गई है, जिनमें देवी-देवताओं, धार्मिक स्थलों और आध्यात्मिक हस्तियों को ऐसे रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जिसका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं होता। कई बार भगवानों की तस्वीरों को इस तरह जीवंत दिखाया जाता है कि वे बोलते हुए प्रतीत होते हैं। उनके माध्यम से लोगों को डराया जाता है कि ‘इस वीडियो को लाइक या शेयर नहीं किया तो दुर्भाग्य आएगा’ या ‘भगवान नाराज़ हो जाएंगे।’ यह केवल भ्रामक कंटेंट ही नहीं, बल्कि लोगों की आस्था का मनोवैज्ञानिक शोषण भी है।
हाल ही में पुरी के जगन्नाथ मंदिर से जुड़ा एक एआई-जनरेटेड वीडियो वायरल हुआ, जिसमें भगवान जगन्नाथ पर क्रेन से दूध चढ़ाते हुए दिखाया गया। मंदिर प्रशासन ने स्पष्ट किया कि ऐसा कोई धार्मिक अनुष्ठान कभी नहीं हुआ और यह पूरी तरह फर्जी कंटेंट था। इसी तरह उज्जैन के महाकाल मंदिर से जुड़ी एक तस्वीर में एक व्यक्ति को गर्भगृह में बैठा दिखाया गया, जबकि वास्तविकता में वहां केवल अधिकृत पुजारियों को ही प्रवेश की अनुमति होती है। ऐसे उदाहरण बताते हैं कि एआई केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रह गया, बल्कि झूठ को सच जैसा दिखाने का सबसे प्रभावी हथियार बनता जा रहा है।
यह समस्या किसी एक धर्म तक सीमित नहीं है। सिख समुदाय ने भी स्वर्ण मंदिर से जुड़े फर्जी एआई वीडियो पर चिंता जताई है। दुनिया के अन्य देशों में भी धार्मिक पहचान और विश्वास को प्रभावित करने के लिए एआई का उपयोग किया जा रहा है। इजरायल में एक एआई-निर्मित ‘रब्बी’ सोशल मीडिया पर हजारों लोगों को धार्मिक संदेश देता रहा, जबकि बाद में पता चला कि उसका कोई वास्तविक अस्तित्व ही नहीं था। यह घटना इस सवाल को जन्म देती है कि डिजिटल युग में हम किस पर विश्वास करें और किस पर नहीं।

सबसे गंभीर खतरा तब पैदा होता है जब एआई का इस्तेमाल धार्मिक भावनाओं को भड़काने या सामाजिक विभाजन पैदा करने के लिए किया जाता है। किसी मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे या चर्च से जुड़ी फर्जी तस्वीरें और वीडियो कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुंच सकते हैं। ऐसे कंटेंट न केवल लोगों को गुमराह करते हैं, बल्कि सांप्रदायिक तनाव और अविश्वास को भी बढ़ावा देते हैं। आज सोशल मीडिया पर वायरल होने वाली हर धार्मिक तस्वीर या वीडियो सत्य नहीं होती, लेकिन उसकी पहुंच और प्रभाव अक्सर सत्य से कहीं अधिक होता है।
राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से यह स्थिति और भी चिंताजनक है। एआई के माध्यम से धार्मिक प्रतीकों और भावनाओं को प्रभावित करना अब केवल शरारत नहीं रह गया है। यह जनमत को प्रभावित करने, सामाजिक ध्रुवीकरण बढ़ाने और भीड़ की भावनाओं को नियंत्रित करने का माध्यम बन सकता है। जब तकनीक आस्था के साथ मिलकर भ्रम पैदा करती है, तब उसका असर केवल डिजिटल दुनिया तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज की वास्तविक शांति और एकता पर भी पड़ता है।
सौभाग्य से न्यायपालिका और कुछ संस्थाएं इस खतरे को गंभीरता से लेने लगी हैं। अदालतों ने एआई-जनरेटेड डीपफेक और भ्रामक कंटेंट के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है। लेकिन केवल कानूनी कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को ऐसे कंटेंट की पहचान और हटाने की जिम्मेदारी निभानी होगी। साथ ही, लोगों को भी डिजिटल साक्षरता के प्रति जागरूक बनाना होगा ताकि वे हर वायरल वीडियो को आंख मूंदकर सच न मान लें।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें धर्म और आस्था की मूल भावना को समझना होगा। कोई भी धर्म भय के आधार पर नहीं चलता। भगवान, गुरु या आध्यात्मिक परंपराएं कभी लाइक, शेयर या फॉरवर्ड की शर्त नहीं रखतीं। यदि कोई वीडियो लोगों को डराकर धार्मिक आस्था का लाभ उठाने की कोशिश करता है, तो वह श्रद्धा नहीं, बल्कि धोखे का कारोबार है।
एआई, मानवता की प्रगति का साधन है, लेकिन जब वही तकनीक विश्वास को भ्रम में बदलने लगे तो समाज को सतर्क होना पड़ता है। हमें तकनीक का विरोध नहीं करना है, बल्कि उसके दुरुपयोग का प्रतिरोध करना है। आस्था का सम्मान और तकनीक का जिम्मेदारी के साथ उपयोग, इन्हीं दोनों के संतुलन में भविष्य की सुरक्षा छिपी है। यदि समय रहते इस चुनौती को नहीं समझा गया, तो आने वाले वर्षों में सच और झूठ के बीच की रेखा इतनी धुंधली हो जाएगी कि सबसे बड़ा नुकसान हमारी सामाजिक एकता और धार्मिक विश्वास को होगा। ========

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