हमारी परंपरा से जुड़ा अंगदान, आज विज्ञान के साथ दे रहा नए जीवनदान -डॉ. अतुल मलिकराम (राजनीतिक रणनीतिकार)

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मृत्यु के बाद भी किसी के जीवन का हिस्सा बनकर रह जाना शायद मानव जीवन की सबसे बड़ी सार्थकता है। अंगदान इसी भावना का आधुनिक रूप है। आज विज्ञान ने यह संभव बनाया है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके हृदय, किडनी, लीवर, फेफड़े और अन्य अंग किसी जरूरतमंद को जीवन दे सकें। लेकिन दूसरों के लिए अपने शरीर का कुछ हिस्सा या पूरी देह समर्पित करने का विचार भारतीय संस्कृति में नया नहीं है। यहां एक बात स्पष्ट समझना जरूरी है। प्राचीन भारत में आज की तरह किडनी, लीवर या हृदय का आधुनिक प्रत्यारोपण नहीं होता था। ऐसे प्रत्यारोपण का वैज्ञानिक आधार और तकनीक बहुत बाद में विकसित हुई। लेकिन शरीर, ऊतक और जीवन को दूसरे के हित में समर्पित करने की सोच के उदाहरण भारतीय परंपरा और साहित्य में जरूर मिलते हैं।
महर्षि सुश्रुत इसका सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। उन्हें भारतीय शल्य चिकित्सा के महान आचार्यों में गिना जाता है। सुश्रुत संहिता में शल्य चिकित्सा, मानव शरीर की रचना और कई तरह की पुनर्निर्माण प्रक्रियाओं का वर्णन मिलता है। विशेष रूप से नाक के पुनर्निर्माण के लिए गाल या माथे की त्वचा के फ्लैप के इस्तेमाल का उल्लेख मिलता है। चिकित्सा इतिहास के शोध में इसे रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी का महत्वपूर्ण शुरुआती उदाहरण माना गया है। इसलिए सुश्रुत को आधुनिक ऑर्गन ट्रांसप्लांट का जनक कहना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं होगा, लेकिन यह कहना उचित है कि प्राचीन भारतीय चिकित्सा में शरीर के क्षतिग्रस्त हिस्सों के पुनर्निर्माण की उन्नत समझ मौजूद थी। सुश्रुत संहिता में करीब 300 सर्जिकल प्रक्रियाएं और अनेक सर्जिकल इंस्ट्रूमेंट्स के वर्णन का उल्लेख चिकित्सा इतिहास के शोध में मिलता है।
हमारी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में भी शरीर के त्याग और परोपकार की कई कथाएं हैं। महर्षि दधीचि ने देवताओं के हित में अपनी अस्थियों का दान किया, बाद में यह कथा त्याग और लोककल्याण का प्रतीक बन गई। राजा शिबि की कथा भी यही संदेश देती है कि दूसरे प्राणी की रक्षा के लिए अपना सुख और शरीर तक दांव पर लगाया जा सकता है। इन कथाओं को आधुनिक चिकित्सा की तकनीकी मिसाल कहना उचित नहीं होगा, लेकिन इनके भीतर छिपी परोपकार और त्याग की भावना आज के अंगदान अभियान से जरूर जोड़ी जा सकती है। भगवद्गीता का शरीर और आत्मा को लेकर दिया गया दर्शन भी इस चर्चा को एक अलग दृष्टि देता है। गीता शरीर को नश्वर और आत्मा को अविनाशी बताती है। इसका अर्थ यह नहीं कि गीता सीधे आधुनिक अंगदान की बात करती है, लेकिन इससे यह विचार जरूर निकलता है कि शरीर के प्रति अत्यधिक मोह से ऊपर उठकर व्यापक लोकहित के बारे में सोचा जा सकता है।
आज जरूरत इस सांस्कृतिक भावना को आधुनिक चिकित्सा विज्ञान से जोड़ने की है। भारत में अंग प्रत्यारोपण की संख्या बढ़ी है, लेकिन जरूरत और उपलब्धता के बीच बड़ा अंतर अब भी है। नोटो के अनुसार 2023 में देश में कुल 18,378 ऑर्गन ट्रांसप्लांट्स हुए। इनमें डिसीज्ड डोनर्स से हुए ऑर्गन ट्रांसप्लांट्स की संख्या केवल 2,935 थी। नोटो यह भी बताता है कि देश में ऑर्गन डोनेशन रेट अब भी एक प्रति दस लाख आबादी से कम है। मध्य प्रदेश के लिए यह चुनौती और महत्वपूर्ण है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2023 में राज्य में 290 ऑर्गन ट्रांसप्लांट्स हुए, जबकि देश में कुल संख्या 18,378 थी। यानी राष्ट्रीय हिस्सेदारी करीब 1.6 प्रतिशत बैठती है। ऐसे में जागरूकता, अस्पतालों में ट्रांसप्लांट इंफ्रास्ट्रक्चर, प्रशिक्षित कोऑर्डिनेटर्स और परिवारों की सहमति, इन सभी क्षेत्रों में लगातार काम करने की जरूरत है। हाल के वर्षों में मध्य प्रदेश से सामने आई अंगदान की कहानियां उम्मीद जगाती हैं। इंदौर के गौरव दवे के परिवार ने उनकी ब्रेन डेथ के बाद उनके हृदय, लीवर और दोनों किडनी दान करने की सहमति दी, जिससे चार मरीजों को जीवन मिला। उनके अंगों को ग्रीन कॉरिडोर के जरिए इंदौर और अहमदाबाद पहुंचाया गया और उन्हें गार्ड ऑफ़ ऑनर भी दिया गया। इसी तरह सुरेंद्र पोरवाल के परिवार ने उनके दोनों हाथ, लीवर, किडनी, आंखें और त्वचा दान की। उनके दोनों हाथ मुंबई के एक मरीज के प्रत्यारोपण के लिए भेजे गए थे।
इन उदाहरणों का सबसे बड़ा संदेश यही है कि अंगदान केवल अस्पताल की प्रक्रिया नहीं, बल्कि परिवार, समाज और चिकित्सा व्यवस्था, इन तीनों की साझा जिम्मेदारी है। धार्मिक मान्यताओं को लेकर भ्रम हो या शरीर के अंतिम संस्कार को लेकर चिंता, लोगों के सवालों का जवाब तथ्य और संवेदनशीलता से दिया जाना चाहिए। भारत की पुरानी परंपरा हमें परोपकार का संदेश देती है और आधुनिक चिकित्सा उस भावना को जीवन बचाने की वास्तविक क्षमता देती है। इसलिए अंगदान को किसी एक धर्म, जाति या वर्ग से जोड़ने के बजाय इसे मानवता के साझा दायित्व के रूप में देखना होगा। मृत्यु जीवन का अंत हो सकती है, लेकिन अंगदान किसी और के लिए एक नई शुरुआत बन सकता है। यही वह सोच है, जिसे जन-जन तक पहुंचाने की जरूरत है।

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